क्या कभी भी आपने सुना है कि, “किसी भिखारी ने आत्महत्या कर ली?”


150 रु का एक कप कॉफी बेचने वाले सीसीडी के फाउंडर विजी सिद्धार्थ ने ये लिखकर आत्महत्या कर ली कि मैं असफल रहा, मुझे माफ़ करना। सीसीडी जैसी नामी कैफे श्रंखला देशभर में चलाने, और कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री का दामाद होने के बावजूद सिद्धार्थ को लगा कि वे असफल रह गए हैं। तो फिर सफलता क्या होती है? इस हिसाब से तो हमें और आपको आज ही आत्महत्या कर लेनी चाहिए।

सिद्धार्थ ने जितनी आलीशान ज़िन्दगी को जिया है वो करोड़ो में से किसी एक को मिलती है। एक कड़वी बादाम मुँह में आ गयी तो उन्होंने ज़ुबान काटकर फेंक दी। जो कुछ उन्होंने हासिल किया, जितने लम्हो की उन्होंने बेहतरीन ज़िन्दगी गुज़ारी, चाहते तो उसके लिए थैंक्यू बोल सकते थे। उनके कैफे का वेटर भी दिनभर नजाने कितने आगन्तुकों को थैंक्यू बोलता होगा, हालांकि थैंक्यू तो मेहमान को बोलना चाहिए। लेकिन सिद्धार्थ ने ज़िदंगी को थैंक्यू बोलना नहीं सीखा। बल्कि उन्होंने सॉरी बोला, छलांग लगाई और सोचा कि चलो खाता बन्द हो गया।

चाहते तो अपनी सफलता से लगाकर विफलता तक के सफर पर एक किताब लिखवाते, लोगों को समझाते कि सफल इस तरह से हुआ जाता है और विफल इस तरह से.. और बताते लोगों को कि अर्श से फ़र्श पर आने के बाद भी कहीं किसी छोटे से खेत में धनिया बो कर शांति से जीवन गुज़ारा जा सकता है। ज़िंदगी विकल्प देती है। आपका दिमाग़ आपको विकल्प इस्तेमाल करने के बीच में रोड़ा उत्पन्न करता है।

आज ही इलाहाबाद के एक बड़े व्यापारी ने घाटा खाकर आत्महत्या कर ली। इस तरह से उनका घाटा पूरा हो गया होगा! व्यापारी की मौत के साथ अनेकों लोगों की उम्मीद भी मर गयी होगी जो उनमे पैसा मांगते थे। 15-20 कर्मचारी जो उनके यहाँ काम करते हैं वे भी बेरोज़गार हो गए होंगे। हो सकता है कल को इनमे से भी कोई आत्महत्या कर ले। क्योंकि अभी फिलहाल लाइफ का स्विच ऑफ करने का ट्रेंड चल रहा है।

अच्छा ! क्या आपने कभी सुना कि “किसी भिखारी ने आत्महत्या की?? मेरी नज़रों के सामने से कभी कोई ऐसी ख़बर नहीं गुज़री जिसमे भिखारी ने आत्महत्या की हो।

अलबत्ता भिखारी भूख से मरते पाए जाते हैं, बीमारियों से मरते पाए जाते हैं लेकिन सैलून से ब्लेड लेकर हथेली की नसें काटते हुए नहीं पाए जाते।

आप भिखारी को 1 रुपया भी देंगे, तब भी वो ईश्वर को थैंक्यू बोलेगा, आपको दुआएँ देगा। क्योंकि वो नाशुक्रा नहीं है। वो महत्त्वकांशी नहीं है। जितना है वे उतने में खुश है। हाथ पैर कटे हुए हैं, मुँह में जुबा नहीं है, फिर भी ज़िन्दगी को, रब को, आपको थैंक्यू बोलते हैं। वे फटेहाल है, अपने ग़म से भी राज़ी है।
फ़िल्म अनपढ़ के गीत की पंक्ति है “मुझे ग़म भी उनका अज़ीज़ है, कि उन्हीं की दी हुई चीज़ है”। उनका सोचना है कि रब ने मुझे दुनिया की दौलत नहीं दी, तो क्या हुआ! भक्ति का भाव तो दिया, अकीदत तो दी, शिद्दत तो दी, मुहब्बत दी, शुक्रगुज़ार दिल दिया।

किसी फ़क़ीर की ख़ुराक 4 रोटी की है, आप उसे 1 रोटी देंगे वो थैंक्यू बोलकर खा लेगा। और आप क्या करेंगे?? थोड़ा सा ज़िदंगी ने छीन लिया, तो सॉरी बोलकर निकल लेंगे?? या उन लम्हों का शुक्र अदा करेंगे जो आपने जिये हैं।

– अब्बास पठान, जोधपुर

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार है)


 

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