नज़रिया

AIMIM वेलफेयर पार्टी की जीत और उर्दू आंदोलन, राजस्थान में नया राजनैतिक विकल्प बन सकेगा?

By admin

November 23, 2020

राजस्थान की राजनीति मे एक अर्से कांग्रेस-भाजपा के रुप मे दो दलीय व्यवस्था कायम होने के कारण मतदाताओं के सामने उक्त दोनो दलों के उम्मीदवारों को छोड़कर तीसरे दल के उम्मीदवार के पक्ष मे मतदान करने के विकल्प की पूर्ति लगता है कि आगामी विधानसभा चुनावों में वेलफ़ेयर पार्टी ऑफ इंडिया और ओवैसी के दल एआईएमआईएम के रुप मे होने की सम्भावना बनती नजर आ रही है।

फिलहाल कुछ सीमित जगहो पर बसपा व वामपंथी विकल्प के तौर पर नजर आते है। लेकिन बसपा के निशान पर विजयी होने वाले विधायकों को कांग्रेस मे शामिल होने से जनता अपने आपको ठगी हुई महसूस करती आ रही है।

आजादी के बाद राजस्थान मे लोकतांत्रिक प्रक्रिया शूरु होने से लेकर 1977 से पहले तक कांग्रेस के अतिरिक्त जनसंघ, लोकदल, स्वतंत्र पार्टी के रुप मे मतदाताओं के सामने मतदान कर अपने पसंद के जनप्रतिनिधि चुनने का के विकल्प मोजूद थे। लेकिन 1977 में सभी विपक्षी दलों द्वारा एक जगह जमा होकर जनता पार्टी का गठन करने के बाद हुए चुनाव में मिली सफलता से प्रदेश मे भैरोसिंह शेखावत के नेतृत्व मे पहली गैर कांग्रेसी सरकार गठित हुई थी।

उसके बाद 1980 में गैर कांग्रेस दल फिर अलग अलग हुये ओर जनसंघ ने भाजपा का रुप धारण किया और स्वतंत्र पार्टी से जुड़े नेताओं ने जनता पार्टी को कायम रखा जिसके राजस्थान मे कल्याण सिंह कालवी नेता होते थे। इसके बाद जनता पार्टी-लोकदल ने मिलकर जनता दल का रुप लिया ओर गैर कांग्रेस दल भाजपा से समझोता करके 1990 मे फिर भैरोंसिंह शेखावत के नेतृत्व मे प्रदेश मे जनता दल-भाजपा गठजोड़ की गैर कांग्रेस सरकार बनाई गई। उस समय वामपंथियों का जनता दल से गठजोड़ था।

रास्ट्रीय स्तर पर विवाद होने पर तेजतर्रार मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत ने जनता दल के विधायकों मे विघटन करके अपनी सरकार को बचाये रखा लेकिन 1992 मे बाबरी मस्जिद शहीद होने पर सरकार बर्खास्त हुई पर उसके बाद हुये चुनाव मे भैरोंसिंह शेखावत फिर मुख्यमंत्री बने जो 1998 मे गहलोत के मुख्यमंत्री बनने तक रहे। पर तबतक राजस्थान मे एक तरह से तीसरा विकल्प विलुप्त हो चुका था। राजस्थान मे 1993 से लगभग कांग्रेस-भाजपा के रुप मे दो दलीय सिस्टम कायम हुवा जो लगातार आज भी जारी है। बीच बीच मे सीमित क्षेत्रो मे विकल्प के रुप मे वामपंथी दल व बसपा के रुप उभरे लेकिन माकपा को कमजोर करने के लिये कांग्रेस-भाजपा एक होते दिखाई दिये तो बसपा को कांग्रेस हज़म करती नजर आई।

इन सबके मध्य मुस्लिम मतदाताओं के सामने मात्र कांग्रेस के रुप मे एक ही विकल्प बचा रहता आया। मुस्लिम मतदाता कांग्रेस से नाराज भी हुये पर कुछेक जगह उन्होने निर्दलीय उम्मीदवार को मत दे दिये या फिर उदासीन होकर कभी कभार मतदान प्रतिशत कम कर लिया।

भारत मे मुस्लिम मतदाता व धर्मनिरपेक्ष दल

भारत का मुस्लिम मतदाता धर्मनिरपेक्षता के नाम पर सालों साल कांग्रेस से जुड़ा रहा पर उसके बावजूद जब कांग्रेस मे उनके साथ इंसाफ ठीक से नही हुआ तो उन्होंने धर्मनिरपेक्षता के नाम पर जहां जहां क्षेत्रीय दल गठित हुये वहां वहा उन्होंने कांग्रेस को छोड़कर आसाम, तमिलनाडु, केरल, बगाल, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश सहित हिन्दी भाषी क्षेत्र मे सपा, बसपा, राजद, आप, लोकदल सहित अन्य दलो को मत देकर अपना भविष्य तलासना शुरू किया। लेकिन फिर भी मुस्लिम समुदाय को संतुष्टि नही पाई जो वो चाहते थे।

अब जाकर मुस्लिम समुदाय राजनीति मे जब कथित धर्मनिरपेक्ष नेताओं की राजनीति से संतुष्ट नही हो पाये तो अब वो अपना भविष्य मुस्लिम नेता के नेतृत्व वाले दलो मे तलाशने की कोशिश करते नजर आने लगे है।

जैसे आसाम मे मोलाना बदरुद्दीन अजमल के दल के साथ तो तेलंगाना मे बेरिस्टर असदुद्दीन आवेसी के दल के साथ मिलकर। एवं अब अन्य प्रदेशों मे भी ओवेसी के साथ चलने की कोशिश करते नजर आ रहे है।

असदुद्दीन आवेसी के तेलंगाना से निकल कर पहले महाराष्ट्र मे चुनाव लड़कर एक सांसद व विधायक अपने दल के निसान पर जीतवाने मे कामयाब होने के साथ ही उन्होंने अन्य प्रदेशों मे उम्मीदवार लड़वाने का तय कर चुनाव लड़े तो पहली दफा बिहार मे उनके पांच विधायक जीतकर विधानसभा मे पहुंचे। तेलंगाना मे आवेसी के दल एआईएमआईएम के सात विधायक है फिर बिहार मे पांच विधायक है। इसके बाद महाराष्ट्र मे एक सांसद व दो विधायक है। लेकिन आवेसी महाराष्ट्र की बजाय बिहार मे मिली कामयाबी से अधिक उत्साहित नजर आये। बिहार चुनाव के बाद उन्होंने बंगाल व यूपी विधानसभा चुनाव मे अपने उम्मीदवार लड़ाने का ऐलान कर दिया है।

इसी के मध्य बिहार चुनाव के बाद राजस्थान के अनेक लोगो ने आवेसी तक राजस्थान मे आकर उम्मीदवारों को चुनाव लड़ाने की बात पहुंचा कर राजनीतिक हालात बताये। बताते है कि मिली रिपोर्ट के बाद ओवैसी ने अपने थींक टैंक को राजस्थान पर मंथन करने का कहा बताते। ग्रैटर हैदराबाद नगरनिगम की सभाओ मे असदुद्दीन आवेसी ने राजस्थान विधानसभा चुनाव मे उम्मीदवार खड़े करने का इशारा कर दिया है।

राजस्थान के कुछ नेताओं ने गहलोत सरकार द्वारा मुस्लिम समुदाय की निरंतर उपेक्षा करने व कांग्रेस के अलावा उनके पास कोई विकल्प नही होने की मजबूरी के अलावा युवाओं मे ओवेसी व उसके दल की बढती लोकप्रियता से नेताओं द्वारा उनको अवगत करवाने के बाद एआईएमआईएम के नेताओं ने राजस्थान पर फोकस करना शुरू कर दिया है। उर्दू के साथ हो रही ज़्यादती और गहलोत सरकार का इसके प्रति उदासीन रवैया मुसलमानों के वोट छिटका सकता है. वहीं कोटा नगर निगम में वेलफ़ेयर पार्टी ऑफ इंडिया ने अपनी पहली जीत दर्ज की है. WPI भी आगामी विधान सभा चुनाव में एक मज़बूत विकल्प के तौर पर उभर सकती है.राजस्थान में 200 विधानसभा सीटों में से 30 सीटें ऐसी हैं जहाँ मुस्लिम मतदाता जीत हार में फ़ैक्टर होते हैं.