प्रशासन की विफलता पर हम नेताओं से सवाल क्यों नहीं करते, यह खामोशी विध्वंसक है !


खामोशी विध्वंसक है !

“हमारा नेता कैसा हो ?” यह सवाल केवल फिल्मों और सोशल मीडिया तक ही सीमित है। असल मुद्दा तो ये है कि हम नेताओं से सवाल कितनी बार करते हैं ?

अंधभक्ति औऱ चापलूसी में घिरा आज का मतदाता वाकई में अगली पीढ़ी के लिए बर्बादी का माहौल बनाए जा रहा है।

इनसे सवाल होंगे कि क्या आप लोगों ने हमारे लिए यही प्लेटफार्म तैयार किया था ,जिसमें “जी हुजूर…हाँ साब…ठीक है साहब” का बोलबाला है ।

“तबाह कर दिया अहबाब को सियासत ने
मगर मकान से झंडा नहीं उतरता है ”
~शकील जमाली ।

चुनावों में वो लम्बी-लम्बी कतारें लगाना ,चौपाल व गली-नुक्कड़ में बहस करना,राजनेताओं के समर्थन की रैलियों में शामिल होना,घर की औरतों को चुनाव चिह्न समझाना आदि हम किस लिए करते हैं ?

शायद अपने हितों की रक्षा व क्षेत्र की भलाई के लिए । हमने किस आधार पर सरकारों व नेताओं को चुना ?

वाकई में वर्तमान की स्थिति को देखकर यूं लगता है कि हम वर्षों से पार्टी के झंडे तले खड़े होकर अपना सब कुछ बिकता हुआ देखते रहते हैं ।

हम बेरोजगारों को रोजगार ,भूखों को रोटी ,बेघरों को घर आदि के लिए अपने नेताओं से सवाल क्यों नहीं करते हैं ?

धर्म मन की शांति औऱ ईश्वर से डरकर जीवन में बुराई से दूर रखने का मार्ग है ,लेकिन याद रखना धर्म रोटी नहीं देता ,धर्म खेती नहीं है ,धर्म कोई मुआवजा नहीं है ।

क्या उन पैदल चल रहे मजदूरों को तुम धर्म की बात करकर उनका दर्द मिटा सकते हो ? लम्बा सफर तय करने वाली उन औरतों को माहवारी के दौरान कपड़ा भी नसीब नहीं हो रहा है ,क्या उनको तुम धर्म की बात बता सकते हो ?

“यहां तो केवल गूंगे औऱ बहरे लोग बसते हैं
खुदा जाने यहां पर किस तरह का जलसा हुआ होगा”
~ दुष्यंत कुमार ।

ये जो नफ़रत फैलाई जा रही है ,क्या इसमें हम मौजूद नहीं हैं ? पालघर में जिन साधुओं की हत्या हुई क्या वो हमारे नहीं थे ? मध्यप्रदेश के बैतूल में दीपक बुंदेले को मुस्लिम समझकर पुलिस ने पीट दिया ,क्या दीपक हमारा नहीं था ?

संस्थाओं का साम्प्रदायिकरण हो रहा है, लेकिन हमारी क्रांति आज भी साम्प्रदायिक भेदभाव के खिलाफ ना होकर अलग ही व्यर्थ के मुद्दों के लिए होती है।

क्या हमारी संस्कृति हमें प्यारी नहीं है? जो आये दिन बलात्कार औऱ मोब्लिंचिंग के बढ़ते मामलों के खिलाफ हम सवाल नहीं करते।

क्या हमने कभी सोचा कि वाकई में हमारी स्वतंत्र संस्थाओं और न्यायालयों को राजनीति से दूर रखना चाहिए ,क्योंकि इंसाफ के नाम पर कूटनीति ना हो यही हर देशवासी की चाहत होती है ।

“हुकूमत से एजाज अगर चाहते हो
अंधेरा है लेकिन लिखो रोशनी है ”
~ अशरफ मालवी ।

देश में बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक जिस विषय पर अगर पर्याप्त ज्ञान है तो वह है भ्रष्टाचार। निचले लेवल से शुरू होकर उच्च स्तर पर होने वाले घपलों के जिम्मेदार हम सब है ।

पॉवर का इस्तेमाल करकर आर्थिक व अन्य लाभों को स्वार्थपूर्ण ढ़ंग से प्राप्त करना ही भ्रष्टाचार कहलाता है ।निर्धारित कर्त्तव्यों की जान-बूझकर अवहेलना करना ही भ्रष्टाचार है। राजपूत काल , सल्तनत काल, ब्रिटिशकाल में भी इसके प्रमाण मिलते हैं ।

‘करप्शन परसेप्शन इंडेक्स 2019’ में भारत 80 नम्बर पर है। यह सब इसलिए भी बढ़ा है क्योंकि हम खामोश हैं ।

हम दूसरे राजनीतिक दल की कमियों में लगे रहते हैं ।जो पॉवर में है उनसे सवाल नहीं करते क्योंकि हमारा जमीर मर चुका है।

भारत में धर्म , शिक्षा , राजनीति, कला, प्रशासन, खेल -कूद इत्यादि सभी मे भ्रष्टाचार ने पांव फैला दिए हैं ।

युवा वर्ग बेरोजगारी की मार से परेशान है ,वह अपनी इच्छाओं की पूर्ति करने औऱ तेज गति से पैसे कमाने के लिए अनुचित कार्यों में लिप्त होता जा रहा है।

गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई, नौकरशाही का विस्तार, लालफीताशाही, प्रशासनिक उदासीनता, अशिक्षा, अत्यधिक प्रतिस्पर्धा, अनैतिक व्यवहार, मद्यपान, वेश्यावृत्ति, तस्करी आदि कारणों से भी भ्रष्टाचार में वृद्धि हुई है।

लेकिन हम इन्हें नजरअंदाज कर देते हैं क्योंकि हमारे दो बड़े गुट बने हुए हैं । एक तो सरकार या कार्यालयों को चाहने वालों का और दूसरा इनसे सवाल पूछने वालों का ।

इस झोड़- झपट में सरकारें बदलती रहती है और दोनों पक्षों का बारी-बारी से शोषण होता रहता है । ठोकर खाने से अक्ल आती है लेकिन यहां तो लोग वर्षों से इसी अंदाज में खुद का नुकसान करवाएं जा रहे हैं ।

धर्म में चेतना का शुद्धिकरण होता है औऱ कोई भी धर्म मनुष्य-मनुष्य के बीच भेदभाव करना नहीं सिखाता।

भारतीय समाज विविधताओं में एकता वाला समाज है।भारतीय संविधान में स्पष्ट कहा है कि लिंग ,धर्म,जाति के आधार पर किसी भी नागरिक के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता।

लेकिन वास्तविकता यह है कि हमारी राजनीतिक गतिविधियों में सांप्रदायिकता , जातीयता, क्षेत्रीयता जैसी भावनाएं गहराई तक प्रवेश कर चुकी है ।

राष्ट्रीय अखंडता हेतु धर्मनिरपेक्षता अनिवार्य शर्त है। कई सालों से देश के दोनों बड़े राजनीतिक दल में अलग-अलग समाज के लोगों को उनकी बिरादरी का चेहरा दिखाकर वोट मांगे जाते हैं और अंत मे सत्ता शक्ति किसी औऱ के हाथों में दे दी जाती है।

अलग -अलग समुदाय और समाज के लोगों को इस प्रकार पागल बनाया जाता है कि किसी पार्टी विशेष को चुनने पर ही आपको किसी एक समुदाय का सच्चा अनुयायी माना जाएगा ,अगर आप दूसरे राजनीतिक दल में जाते हो तो आपको उस धर्म से पार्टी के लोगों द्वारा बर्खास्त सा कर दिया जाता है ।

हालांकि आजकल तो राष्ट्रवादी का प्रमाण पत्र भी कुछ लोग बांटते रहते हैं । विडम्बना ये है कि हमें आज भी सवाल करने के दौरान कौम औऱ समुदाय के लोगों पर खतरा नज़र आ जाता है ।

लोग देश के प्रधानमंत्री को पूरे दिन गाली गलौज करने से नहीं थकते औऱ जब उन्हें रोका जाता है तो अभिव्यक्ति की आजादी , लोकतंत्र का हिस्सा , सवाल पूछने का अधिकार आदि की दुहाई देने लगते हैं।

लेकिन जब उनके विधायक पर भी कोई टिका-टिप्पणीं कर दे तो वो लोग चापलूसी में इस कद्र डूबे हुए हैं कि उन्हें दर्द होने लगता है और वो लोग सोशल मीडिया पर सवाल पूछने वाले को बेकार करार कर देते हैं ।

“जिस को अब भी हो सियासत पे यकीन
उस को ये मुल्क दिखाया जाए ”
~ रजनीश सचन ।

वाकई में हमारी खामोशी विध्वंसक है । देश के हालातों को मध्य नजर रखते हुए अगर हम चिंतन करें तो आज हमारी जरूरत सुदृढ और उत्कृष्ट सिस्टम की है ।

न्याय की जरूरत पर हमें न्याय मिले और अन्य वाजिब मज़बूरी में सहायता, यही हमारी सरकार से आस होनी चाहिए।

कोई भी धर्म खतरे में नहीं है ,अगर कोई खतरे में है ,तो वो है हमारी अगली पीढ़ी, जिसके लिए हम ये कमजोर और नकली व्यवस्था छोड़कर जाएंगे ।

मेरी आपसे दरख़्वास्त है कि आप लोग अगर सत्ता से सवाल करने में असमर्थ हैं , तो कम से कम अंधभक्ति औऱ चापलूसी तो ना करें।

✍️ आबिद खान गुड्डू


 

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