राजनीति

लोकसभा में राजस्थान से कौन कौन हो सकता हैं कांग्रेस का उम्मीदवार, कवायद हुई तेज

By khan iqbal

January 16, 2019

-अशफ़ाक़ कायमखानी

राजस्थान में लोकसभा चुनावों मे उम्मीदवारो को लेकर कांग्रेस मे हलचल शूरु।

लोकसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस पार्टी ने जिला प्रभारी मंत्रियों के मार्फत जिला स्तर पर संगठन की बैठक आयोजित करके उम्मीदवारों के प्रति राय जानकर व जिला कांग्रेस अध्यक्षो के मार्फत इच्छुक उम्मीदवारों के नाम लेकर प्रदेश कांग्रेस को भेजने का काम लगभग पुरा हो चुका है।

दो पूर्व केन्द्रीय मंत्री भंवर जितेन्द्र सिंह के अलवर से व सुभाष महरिया के सीकर से उम्मीदवार बनना लगभग तय होने के अलावा बाडमेर से पूर्व केंद्रीय जसवंत सिंह के पूत्र सांसद मानवेंद्र सिंह की उम्मीदवारी भी लगभग तय मानी जा रही है।

हालांकि राजस्थान मे हाल ही मे सम्पन्न हुये विधानसभा चुनावों मे कांग्रेस व भाजपा को मिले मत प्रतिशत मे मात्र एक प्रतिशत का अंतर होने के बावजूद एक रामगढ़ सीट पर बसपा उम्मीदवार के देहांत होने के कारण चुनाव स्थगित होने पर 199 सीट पर हुये चुनाव मे बहुमत से एक सीट कम आने पर अपने 99 विधायकों के अलावा गठबंधन दल के एक विधायक के अलावा 12 निर्दलीय व 6 बसपा विधायकों के समर्थन मिलने पर कांग्रेस ने अशोक गहलोत के नेतृत्व मे सरकार तो बना ली है। लेकिन सचिन पायलट के मुख्यमंत्री ना बनने से गूज्जर बीरादरी की नाराजगी व मुस्लिम समुदाय को मंत्रिमंडल, विभाग बंटवारे मे उचित प्रतिनिधित्व व सम्मान ना मिलने के कारण के अलावा एक महाअधिवक्ता व सोलह अतिरिक्त महाअधिवक्ताओ की नियुक्ति मे एक को भी प्रतिनिधित्व ना मिलने से समाज मे छाई उदासीनता के अलावा जाट समुदाय मे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को लेकर पहले से बनी आ रही धारणा को लेकर कांग्रेस की परेशानी मे इजाफा करती नजर आ रही है।

इसके अतिरिक्त माकपा द्वारा प्रदेश की कुल पच्चीस सीटो मे से सीकर, चूरु व बीकानेर नामक तीन क्षेत्र से मजबूती से चुनाव लड़ने एवं बसपा-सपा के यूपी मे गठबंधन बनने का असर राजस्थान के सीमावर्ती क्षेत्रो मे आने के अलावा आरक्षित सीट बांसवाड़ा व उदयपुर से दो विधायकों वाली भारतीय ट्राईबल पार्टी के एवं तीन विधायकों वाली राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के चुनाव लड़ने की घोषणा से कांग्रेस की राह कठिन होती नजर आ रही है।

लोकसभा चुनाव के पहले मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपनी शतरंजी चाल के बल पर सचिन पायलट को मुख्यमंत्री की चेयर से दूर रखकर व कांग्रेस के राष्ट्रीय महामंत्री सीपी जोशी को विधानसभा अध्यक्ष बनवा कर अपनी सरकार चलाने के रास्ते मे आने वाले सम्भावित रोड़ो को एक दफा दूर तो कर लिया है। लेकिन लोकसभा चुनाव मे अच्छे परिणाम लाना उनके लिये एक बडी चुनौती मानी जा रही है। दूसरी तरफ कांग्रेस के अधीकांश नेता व कार्यकर्ता बोर्ड, निगम व समितियों का गठन लोकसभा चुनाव से पहले करके सभी स्तर पर उत्साह लाने का दवाब बनाने मे लगे है।

वही मुख्यमंत्री की अब तक टरकाते टरकाते सरकार के तीन साल निकलने पर उक्त मनोयन करने की बन चुकी छवि के चलते प्रदेश मे एक अलग तरह का माहोल बनने लगा है। कांग्रेस के राष्ट्रीय स्तर पर कर्नाटक, मध्यप्रदेश व राजस्थान के किसी विधायक को लोकसभा उम्मीदवार नही बनाने का तय करने के बाद राजस्थान मे विधायक बन चुके अनेक पूर्व सांसदो के मंत्रीमण्डल से दूर रहने के चलते सांसद का चुनाव लड़ने की उम्मीदों पर पानी फिरने से वो सभी असमंजस की स्थिति मे बताते है। जबकि बीकानेर की एक सीट को लेकर बवाल मचाकर खासे चर्चा मे आये तत्कालीन विरोधी दल नेता रामेश्वर डूडी के विधानसभा चुनाव हारने के बावजूद चूरु से लोकसभा चुनाव लड़ने की दावेदारी को लेकर तब झटका लगा कि जब लोगो ने हाईकमान को बताया कि पीछले लोकसभा चुनावों मे चूरु से जाट उम्मीदवार प्रताप सिंह तीसरे नम्बर रहे थे। एवं कस्वां के सामने जाट की बजाय गैरजाट उम्मीदवार काफी मजबूत माना व साबित होता रहा है। चूरु लोकसभा क्षेत्र के आठ विधायकों मे से कांग्रेस के जाट विधायक नरेन्द्र बूढानीया व क्रष्णा पूनीया है। बाकी सब कांग्रेस विधायक गैर जाट है।

असल मे कांग्रेस की दिक्कत यह भी है कि सभी लोकसभा क्षेत्रो से उम्मीदवार के तौर पर मजबूत चेहरो का अभाव है। हाल ही मे सम्पन्न हुये विधानसभा चुनावों मे मिले मतो के अनुसार कांग्रेस कुल पच्चीस सीटो मे से बारह सीटो पर आगे रही है। जबकि तेरह पर भाजपा आगे रही है।

टोंक-सवाईमाधोपुर, सीकर, चूरु, करोली-धोलपुर, भरतपुर, झूंझुनू, बीकानेर, नागौर, जोधपुर, बाडमेर-जैसलमेर, जयपुर ग्रामीण, व दौसा मे कांग्रेस आगे रही है। बाकी तेराह पर भाजपा आगे रही। कांग्रेस के आगे रहने वाली उक्त सभी बारह लोकसभा क्षेत्रो मे मुस्लिम-जाट व दलित मतदाताओं की बहुतायत है।

कुल मिलाकर यह है कि राजस्थान मे लोकसभा चुनावों को लेकर कांग्रेस ने राहुल गांधी की जयपुर मे किसान रैली कराने के बाद जिला स्तर पर उम्मीदवारो की पड़ताल को लेकर तैयारी शुरु कर दी है। लेकिन प्रदेश मे सरकार बनने के बावजूद कांग्रेस के भाजपा से अधिक सांसद जीतने की सम्भावना पर फिलहाल संशय बरकरार है। अगर कांग्रेस नेता अपने अंदरूनी खटास को खत्म करके मन से मिलकर अपने परम्परागत मतदाताओं मे उत्साह भरकर चुनाव लड़ने मे कामयाब हुये तो परिणाम उनके लिये अच्छा आ सकता है। वरना खतरे की घंटी अभी से उनके लिये अलारम बजाने लगी है। स्वर्ण वर्ग के गरीबो को दस प्रतिशत आरक्षण देना भी भाजपा को लाभ पहुंचा सकता है।