एक ‘मजबूर’ चोर ने ऐसा खत मौका-ए-वारदात पर छोड़ा कि मालिक की भी आंखें भर आई !


भरतपुर उत्तरप्रदेश की सीमा के पास राजस्थान का एक जिला है. यहां से प्रतिदिन सैकड़ों की तादाद में मज़दूर यूपी की ओर पलायन कर रहे हैं.

भरतपुर में रारह के निकट गांव सहनावली निवासी साहबसिंह की साइकिल बुधवार रात बरामदे से गायब हो गई.

साहब सिंह ने साइकिल बहुत खोजी लेकिन नहीं मिली. अगली सुबह बरामदे में झाड़ू लगाते समय कागज का एक छोटा सा टुकड़ा मिला.


जिस मजदूर ने साइकिल चुराई थी उसने साइकिल के मालिक से माफी मांगते हुए चिट्ठी में लिखा कि-

नमस्ते जी,
मैं आपकी साइकिल लेकर जा रहा हूं. हो सके तो मुझे माफ कर देना जी क्योंकि मेरे पास कोई साधन नहीं. मेरा एक बच्चा है उसके लिए मुझे ऐसा करना पड़ा क्योंकि वो विकलांग है, चल नहीं सकता. हमें बरेली तक जाना है.

आपका कुसूरवार

एक यात्री

मज़दूर एवं मजबूर

मो. इक़बाल खान (बरेली)


चिट्ठी पढ़ते ही साइकिल मालिक की आंखों में आंसू आ गए

बरेली के बेबस मज़दूर मोहम्मद इकबाल ने चिट्ठी में अपना दर्द बयां किया था. इस चिट्ठी को पढ़कर साइकिल के मालिक साहब सिंह की आँखें भर आईं.

साहिब सिंह का कहना है कि उसे साइकिल चोरी हो जाने पर बहुत गुस्सा और चिंता थी लेकिन इस चिट्ठी को पढ़कर मेरा गुस्सा अब संतोष में बदल गया है.

मेरे मन में साइकिल ले जाने वाले मोहम्मद इकबाल के प्रति कोई द्वेष नहीं है बल्कि यह साइकिल सही मायने में किसी के दर्द के दरिया को पार करने में काम आ रही है. इस भावना से उसका मन प्रफुल्लित हो गया है.

साहबसिंह ने कहा कि मजबूर और मजलूम मोहम्मद इकबाल ने बेबसी में आकर ऐसा काम किया. अन्यथा बरामदे में और भी कई कीमती चीजें पड़ी थी पर उसने उन्हें हाथ नहीं लगाया.


(फ़ोटो प्रतीकात्मक है)

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